ईपीएफओ वेतन सीमा में बदलाव के लिए केंद्र को सुप्रीम कोर्ट ने 4 महीने का समय दिया

0
7

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) योजना के लिए वेतन सीमा में बदलाव करने के बारे में चार माह के भीतर फैसला करने को कहा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को यह आदेश तब दिया, जब बताया गया कि ईपीएफओ के लिए वेतन सीमा में पिछले 11 सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है।

जस्टिस जेके माहेश्वरी और ए एस चंदुरकर की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया है। याचिका में दावा किया गया था कर्मचारी भविष्य निधि संगठन फिलहाल उन लोगों को कवरेज से बाहर रखता है जिनका मासिक वेतन 15000 रुपये अधिक है।

पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए, याचिकाकर्ता को इस आदेश की प्रति के साथ दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को एक प्रतिवेदन देने को कहा है। इसके साथ ही, केंद्र सरकार को ईपीएफओ के लिए वेतन सीमा में बदलाव करने के बारे में 4 माह के भीतर समुचित फैसला करने का निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने पीठ से कहा कि पिछले 11 साल से वेतन में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों द्वारा तय न्यूनतम वेतन ईपीएपओ की 15000 रुपये प्रति महीने की वेतन सीमा से काफी अधिक है।

उन्होंने पीठ से कहा कि इसकी वजह से अधिकांश कर्मचारी/श्रमिक ईपीएफओ स्कीम के फायदों और सुरक्षा से वंचित रह गए हैं। अधिवक्ता सचदेवा ने पीठ से कहा कि जो कर्मचारी वेतन तय सीमा से अधिक कमाते हैं, उन्हें ईपीएफओ स्कीम का फायदा नहीं मिलता है।

लंबे समय से वेतन सीमा में बदलाव नहीं किए जाने से यह अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों को लागू करने और एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स एक्ट, 1952 के तहत बनाई गई एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड स्कीम, 1952 के तहत वेतन सीमा में मनमाने और अनियमित बदलाव से कर्मचारियों को नुकसान होता है।

सरकार ने वेतन सीमा में अनियमित रूप से बदलाव किया है और कभी-कभी 13-14 साल बाद बिना किसी तय समय-सीमा या महंगाई, न्यूनतम वेतन, प्रति व्यक्ति आय या कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स जैसे संबंधित आर्थिक संकेतकों पर विचार किए बगैर किया है।

श्रमबल के बड़े हिस्से बाहर
याचिका में कहा गया है कि अनियमित तरीके से श्रमबल के बड़े हिस्से को बाहर कर दिया गया है, जो संगठित क्षेत्र में कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा देने के मकसद के खिलाफ है। 16वीं लोकसभा की लोक लेखा समिति ने और ईपीएफओ की अपनी सब-कमेटी (2022), दोनों ने वेतन सीमा में समय-समय पर और सही बदलाव करने की सिफारिश की है, लेकिन जुलाई 2022 में सेंट्रल बोर्ड से मंजूरी मिलने के बावजूद, केंद्र सरकार ने इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

याचिका में कहा गया है कि पिछले 70 सालों में वेतन सीमा बदलाव किसी भी पैमाने के हिसाब से लगातार नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों की न्यूनतम वेतन, आयकर छूट की सीमा, प्रति व्यक्ति नेट नेशनल इनकम में सालाना ग्रोथ रेट, न्यूनतम मजदूरी और सालाना महंगाई दर पर विचार किए बगैर ऐसा किया गया है।

‘पिछले 70 सालों में वेतन सीमा में बदलाव का सांख्यिकी विश्लेषण से पता चलता है कि यह ऊपर बताए गए किसी भी पैमाने के हिसाब से लगातार नहीं रहा है। जबकि वेतन सीमा अभी भी 15,000 रुपये पर बनी हुई है, जबकि कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी इससे कहीं अधिक है। इसकी वजह से इस स्कीम की कवरेज कम हो गई है, जिससे कानून का मकसद पूरे नहीं हो पा रहे हैं।