कोटा। विज्ञान नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर में सोमवार को प्रवचन के दौरान आर्यिका विभाश्री माताजी ने कहा कि तत्वार्थ सूत्र के स्रोतों के अध्याय में धर्म, संयम और साधना ही आत्मा के कल्याण का मार्ग बताते हैं। श्रावक को अपने जीवन में नीति, निष्ठा और संयम का पालन करते हुए दान, यश और धर्म की साधना करनी चाहिए।
माताजी ने कहा कि दान केवल धन से नहीं, बल्कि अपने कर्मों, समय और सद्भाव से भी देना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है, वही सच्चा साधक कहलाता है। उन्होंने कहा कि लालच और क्रोध मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं, इसलिए संयम ही जीवन का आधार होना चाहिए।
‘सम्यक दृष्टि’ के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए माताजी ने कहा कि जो व्यक्ति आत्मा को शुद्ध, स्वतंत्र और अमर समझता है, वही सच्चा साधक है। अहंकार, मोह और कपट से मुक्त होकर धर्म का आचरण करने वाला ही मोक्ष का अधिकारी बनता है।

