आचार्य परंपरा जैन धर्म की अनमोल धरोहर है: आचार्य प्रज्ञासागर

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कोटा। जगपुरा में आयोजित संध्याकालीन मंगल जिनदेशना के दौरान आचार्य प्रज्ञासागर मुनिराज ने श्रावक–समाज को संबोधित करते हुए जैन श्रुत परंपरा और आचार्य–मुनि परंपरा के ऐतिहासिक संरक्षण पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया।

आचार्य श्री ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात आरंभ हुई आचार्य परंपरा जैन धर्म की अनमोल धरोहर है, जिसे सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि श्रवण परंपरा का इतिहास सुरक्षित रहे, इसके लिए आवश्यक है कि भगवान महावीर स्वामी से लेकर वर्तमान तक के सभी पूर्वाचार्यों का जीवनवृत्त संकलित स्वरूप में भविष्य पीढ़ियों तक पहुँचे।

उन्होंने बताया कि नेमिचंद ज्योतिचार्य ने कठिन परिश्रम से भगवान महावीर और आचार्य परंपरा पर दो ग्रंथ संकलित किए, जो वर्तमान में इस विषय पर महत्वपूर्ण दस्तावेज स्वरूप उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त प्रकाशित ग्रंथों की प्रस्तावनाओं में भी अनेक आचार्यों के परिचय शोधपूर्वक संकलित किए गए हैं।

आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत सीमित होने के कारण अनेक चित्र और शिल्पांकन काल्पनिक बनाए गए हैं, इसलिए आवश्यकता है कि उपलब्ध सामग्री को प्रमाणिक रूप से संकलित कर विभिन्न स्रोतों का सम्यक उपयोग किया जाए।