कोटा। पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अवसर पर आयोजित प्रवचन में शुक्रवार को विभाश्री माताजी ने उत्तम मार्दव धर्म विषय पर अपना मंगल प्रवचन दिया। माताजी ने कहा कि धर्म के सम्यक पालन हेतु क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का त्याग करना आवश्यक है। इनमें सबसे सूक्ष्म और प्रबल दोष है अहंकार, जो जीवन को पतन की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति के ज्ञान, सौंदर्य और सामर्थ्य को नष्ट कर देता है। जब तक मनुष्य में अहंकार है, तब तक वह सच्चे धर्म की साधना नहीं कर सकता। अहंकार का त्याग किए बिना आत्मा की शुद्धि संभव नहीं है। माता जी ने उदाहरण देकर समझाया कि “मैं ही करूँ, मैं ही श्रेष्ठ हूँ”—यह भाव अहंकार का द्योतक है, जबकि विनम्रता जीवन को उच्चतम शिखर तक पहुँचाती है।
माताजी ने कहा कि जैसे चाँदनी की शीतलता अंधकार को दूर कर देती है, वैसे ही विनम्रता जीवन से अहंकार रूपी अंधकार को दूर कर देती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ज्ञान का अहंकार, रूप का अहंकार, और धन का अहंकार मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। विनय और सरलता ही व्यक्ति के जीवन को सुंदर और सच्चे धर्म की ओर अग्रसर करती है।
शिविर में कोकिलाबेन अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई से पधारीं डॉ. ओमानशी जैन ने शिविरार्थियों को आहार संबंधी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल क्या खाना है, बल्कि कैसे खाना है, कब खाना है और क्यों खाना है, यह जानना भी अत्यंत आवश्यक है। संतुलित आहार और सही समय पर भोजन करने से शरीर स्वस्थ रहता है और रोगों से बचाव होता है।
चातुर्मास समिति अध्यक्ष विनोद टोरडी एवं कार्यध्यक्ष मनोज जैसवाल ने बताया कि रात्रि में आयोजित कवि सम्मेलन में देशभर के प्रसिद्ध कवि एवं कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

