कोटा के कोविड अस्पताल में बेड होते हुए भी सड़क पर चिकित्सा

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    कोटा। कोरोना पॉजिटिव दंपती को बेड के लिए 8 घंटे संघर्ष करना पड़ा। इसके बाद हंगामा किया, तब जाकर बेड नसीब हुआ। ये तो बानगी भर है। प्रदेश के हर अस्पताल की कमोबेश यही स्थिति है इस बीच, पत्नी का यह आरोप जरूर है कि नया अस्पताल में जहां भर्ती किया गया है, वहां कई बेड खाली पड़े हैं।

    मेरे पति की हालत बिगड़ने के बावजूद भर्ती करने में आनाकानी की जा रही थी। पहले एमबीएस अस्पताल में 4 घंटे इंतजार कराया गया। पर भर्ती नहीं किया गया। हंगामा हुआ तो यहां से नया अस्पताल रेफर कर दिया गया। एक घंटे एंबुलेंस के लिए भटकते रहे, पर सुविधा नहीं मिली। हारकर देवर को बुलाया और एक बाइक पर 3 लोग सवार हुए और नया अस्पताल पहुंचे। वहां भी बेड के लिए संघर्ष करना पड़ा।

    रामनगर देवलीमांझी निवासी ग्यानु बाई (37) पिछले 11 साल से आंगनबाड़ी में आशा सहयोगिनी हैं। कोरोनाकाल में घर-घर जाकर सर्वे के काम मे जुटी रहीं। उनके पति सत्यप्रकाश बैरवा (40) और ग्यानुबाई ने कोरोना टेस्ट कराया तो मंगलवार को दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। ग्यानु बाई ने बताया कि मंगलवार दोपहर 3 बजे इलाज के लिए एमबीएस पहुंचे थे। पति का सेचुरेशन लेबल 88 रह गया। सांस लेने में दिक्कत होने लगी। डॉक्टर से भर्ती करने की गुहार लगाई। डॉक्टर ने बेड खाली नहीं होने का हवाला दिया। ग्यानु ने पति को एमबीएस के रजिस्ट्रेशन काउंटर के सामने ही लेटा दिया। 4 घंटे इंतजार के बाद भी बेड नहीं मिला। तब तक लगभग 7 बज चुके थे।

    हंगामा किया तब बेड मिला
    कुछ लोगों ने मदद का प्रयास किया। अस्पताल प्रशासन से बात की। जवाब एक ही बेड खाली नहीं है। आखिरकार दोनों को नए अस्पताल के लिए रेफर किया गया। ग्यानु ने बताया कि 1 घंटे तक एंबुलेंस भी नसीब नहीं हुई। थक-हारकर देवर को बुलाया। फिर देवर की बाइक पर बैठकर तीनों नए अस्पताल पहुंचे। वहां, ओपीडी में डॉक्टर ने चेक किया। डॉक्टर दवाई लिख दी लेकिन भर्ती का पर्चा नहीं बनाया। उसने भी कहा- बेड खाली नहीं है, घर ले जाओ।

    वहां भी 4 घंटे ओपीडी में ऐसे ही पड़े रहे। पति की तबीयत बिगड़ने लगी, फिर हंगामा किया। रात 11 बजे डॉक्टर,पुलिस सहित स्टाफ के लोग इकट्‌ठे हो गए। हंगामे के बाद बेड नसीब हुआ। जिस जगह भर्ती किया गया है, वहां अभी भी 10-11 बेड खाली हैं।