सरसों तेल सस्ता हुआ तो बढ़ गई शुद्धता, जानिए क्यों

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नई दिल्ली। आजकल सरसों तेल की शुद्धता काफी बढ़ गई है। इसकी वजह सरकार की कड़ाई नहीं बल्कि इसमें मिलाए जाने वाले तेलों की महंगाई है। दरअसल सरसों तेल, आयात किए जाने वाले सोयाबीन डीगम, सीपीओ के मुकाबले कहीं सस्ता बैठ रहा है। सस्ता होने की वजह से इसमें बाकी तेलों की मिलावट नहीं हो रही है और उपभोक्ताओं को शुद्ध देशी तेल खाने को मिल रहा है, जिसकी विशेषकर उत्तर भारत में काफी खपत होती है। ऐसी स्थिति में बढ़ते मांग के बीच किसान मंडियों में रोक रोक कर अपनी ऊपज को ला रहे हैं, जो सरसों में सुधार का प्रमुख कारण है।

दिल्ली के खाद्यतेल कारोबारी और विशेषज्ञ पवन कुमार गुप्ता ने कहा, ”मौजूदा स्थिति जारी रही, सरकार का समर्थन मिलता रहा, किसानों को अपनी तिलहन ऊपज की अच्छी कीमत मिलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब किसान, देश को तिलहन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाना सुनिश्चित कर दें। उन्होंने कहा कि लगभग 35-40 साल पहले हरियाणा के कैथल, पंजाब के तरण तारन, हरियाणा-पंजाब के पुराली, उत्तर प्रदेश के हरदोई जैसे क्षेत्रों में इतनी तिलहन का उत्पादन होता था कि वह बाकी देश की जरुरतों को पूरा करने में सक्षम था। तेल कीमतों और मांग में तेजी के मौजूदा वैश्विक परिदृश्य के बने रहने और सरकार के प्रोत्साहन जारी रहने से हम एक बार फिर पुरानी आत्मनिर्भरता की स्थिति को हासिल कर सकते हैं।

गुप्ता ने कहा कि देश में तेल की कमी को पूरा करने के लिए प्रमुख तेल संगठनों की ओर से कई बार आयात शुल्कों में कमी किए जाने की मांग की जाती है लेकिन पिछले दिनों ऐसा करके सरकार विपरीत परिणाम देख चुकी है जहां देश में आयात शुल्क कम करते ही विदेशों में पाम तेल के दाम बढ़ा दिये गये और तेल कारोबारियों, किसानों और उपभोक्ताओं को इस कमी का कोई लाभ नहीं मिला।

उन्होंने कहा कि अगर किसानों को तेल के अच्छे दाम मिलते हैं या आयात शुल्क के रूप में राजस्व की प्राप्ति होती है तो यह पैसा अंत में अर्थव्यवस्था को ही गति देगा, रोजगार बढ़ेंगे और तिलहन आयात पर किये जाने वाले खर्च को बचाकर हम निर्यात से लाभ भी कमा सकते हैं। मौजूदा समय में विदेशों में भरत के सरसों, सोयाबीन और मूंगफली के खल (डीओसी) की भारी मांग है, जिसका भारत को लाभ मिल सकता है।