बदइंतजामियों की भेंट चढ़ गई समर्थन मूल्य पर खरीद

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  • समर्थन मूल्य का सर्वर डाउन
  • गिरदावरी के लिए भटक रहे किसान

कोटा। समर्थन मूल्य पर खरीद को लेकर प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के कारण किसानों को भटकने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि किसानों को मार्च और जुलाई तक के टोकन दे दिए गए। जबकि समर्थन मूल्य पर खरीद ही अप्रैल से शुरू हुई है और 30 जून तक ही चलने वाली है। ऐसे में, मार्च और जुलाई के टोकन मिलने से खरीद को लेकर आशंकित किसान पसोपेश में हैं और अधिकारियों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।

भारतीय किसान संघ के प्रवक्ता आशीष मेहता ने बताया कि एक ओर तो गिरदावरी को लेकर किसानों को अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर गलत महीने के टोकन देने से किसान भारी अवसाद में हैं। इसमें भी पहले ऑनलाइन पंजीयन कराने वाले किसानों को जून और जुलाई का समय दिया गया है। जबकि बाद में ऑफ़लाइन रजिस्ट्रेशन कराने वाले किसानों को अप्रैल-मई का समय दिया जा रहा है।

खरीद अप्रैल में, टोकन मार्च का: भारतीय किसान संघ के सहमंत्री पवन शर्मा ने बताया कि खण्डगांव के नन्दलाल शर्मा और मुकुट शर्मा ने ऑनलाइन पंजीयन कराया था। जिस पर उन्हें खरीद के लिए 31 मार्च का समय दिया गया। जबकि सुल्तानपुर में 31 मार्च को समर्थन मूल्य पर खरीद ही शुरू नहीं हुई थी। जब 2 अप्रैल को नन्दलाल शर्मा के पुत्र अमित शर्मा टोकन लेकर खरीद केन्द्र पर पहुंचे तो अधिकारियों ने समय निकल जाने के कारण खरीदी से मना कर दिया। अधिकारियों ने अमित शर्मा को मण्डावरा के खरीद केन्द्र पर जाने के लिए कहा है। ऐसे में, किसान को भटकना पड़ रहा है। दूसरी ओर, कईं किसानों को जुलाई के भी टोकन दिए गए हैं। जिला सहमंत्री पवन शर्मा ने कहा कि अधिकारियों के द्वारा किसानों को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन मेें भी सर्वर डाउन: भारतीय किसान संघ तहसील अध्यक्ष अश्विनी जैन ने बताया कि कनवास में काफी समय से तहसीलदार ही नहीं है। जबकि सरकार की ओर से कम्प्यूटर से नकल निकलाकर तहसीलदार से वेरिफाई कराना होता है। जिसके बाद ही कूपन जारी होते हैं। गिरदावरी के लिए प्रोसेस काफी लम्बा कर दिया गया है। कभी अधिकारी फील्ड में चले जाएं तो फिर से ऑफिस का चक्कर लगाना मजबूरी होता है। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन मेें भी सर्वर डाउन हो जाता है। अभी तक छोटे केन्द्रों पर कांटे भी शुरू नहीं हो पाए हैं। जबकि भामाशाह मंडी जैसे बड़े केन्द्रों पर भी नाम मात्र के किसानों की खरीदी की जा रही है। अभी कूपन के लिए केवल 25-30 टन खरीदी के हिसाब से आ रहे हैं। जो कि बहुत कम हैं। सरकार को कांटे बढाने के साथ ही खरीदी क्षमता, गति और टारगेट भी बढाना चाहिए।