‘कोटा के कड़के’ का जायका पहुंचा सात समंदर पार, देखिए वीडियो

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दिनेश माहेश्वरी
कोटा।
राजस्थान का कोटा शहर सिर्फ कोटा साड़ी, कोटा स्टोन, कोटा कचौरी या कोटा कोचिंग लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि ‘कोटा के कड़के. के लिए भी जाना जाता है। ‘कोटा के कड़के’ का जायका अब सात समंदर पार पहुंच चुका है। यह बात सुनने में अटपटी जरूर लगती होगी। परन्तु सच है।

आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों में जाकर बसे भारतीय जब भी कोटा आते हैं, कोटा के कड़के ले जाना नहीं भूलते। कोटा की रामपुरा कोतवाली की गली में शुद्ध अलसी के तेल से बनने वाले यह मोटे सेव कोटा के कड़के के नाम से जाने जाते हैं। इनको खरीदने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

‘कोटा के कड़के’ के विक्रेता और निर्माता गोपाल लाल बागड़ी बताते है कि हालांकि इनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण कोटा ही नहीं दूसरे शहरों में भी इसकी नकल की गई है। वह शुद्ध अलसी के तेल में बनाते हैं, जबकि नकलची लोग सोयाबीन रिफाइंड तेल में बना कर बेच रहे हैं। असली कड़के का स्वाद जो लोग जानते हैं वह सिर्फ उनकी दुकान पर ही आते हैं।

चाहे वह देश के किसी भी राज्य या शहर में रहता हो। विदेश में जाकर बसने वाले भी जब कोटा आते हैं तो उनके यहां के बने कोटा के कड़के ले जाना नहीं भूलते। नितीश सैनी बताते हैं कि ‘कोटा के कड़के’ की शुरुआत उनके दादा चंदा जी ने वर्ष 1950 में की थी। तब से लेकर आज तक इसका स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

उन्होंने बताया कि इस कारोबार में उनकी तीसरी पीढ़ी लगी हुई है। पीढ़ियां बदल गई परन्तु कोटा के कड़के का स्वाद आज भी वैसा ही है। कोटा के कड़के का शौकीन हर पीढ़ी का व्यक्ति है। उनके दादाजी के ज़माने के ग्राहक आज भी उनके यहां से कड़के खरीदते आ रहे हैं। नई पीढ़ी भी इन्हें बहुत पसंद करती है। देश-विदेश में इसकी डिमांड बढ़ने के कारण अब वह ऑनलाइन सेल का काम भी शुरू करने वाले हैं। तो आइये जानते हैं इस वीडियो के माध्यम से कोटा के कड़के का स्वाद और उसके बारे में –

दुबई भी जा रहे हैं कड़के
बैंक के रिटायर्ड अधिकारी विजय माहेश्वरी का कहना है कि उनकी बेटी मोना हर बार कोटा से दुबई कड़के लेकर जाती है। उन्होंने बताया कि पहले हाड़ोती के ग्रामीण अंचल में सभी जगह अलसी के तेल में बने हुए कड़के जिन्हें मोटे सेव या सेवड़े कहा जाता था, खूब प्रचलन में थे।

मेरे दादाजी भी बनाते थे कड़के
वे बताते हैं कि हमारे परिवार में यह काम बारां जिले की मांगरोल तहसील के गांव बमोरी कलां में स्वर्गीय दादा हजारीलाल जी माहेश्वरी के ज़माने से (वर्ष 1947 से भी पहले) से हो रहा था। हमारे यहां कड़के अलसी के तेल में ही बनाये जाते थे। सही नाप तोल के मसालों के साथ अजवायन और घर में ही तैयार चने की दाल के बेसन से कड़के बनाते थे, जिनको स्थानीय भाषा में सेवड़े कहा जाता था।

आसपास के दस बारह गाँवों में प्रसिद्ध थे
बाद में इस काम को हमारे स्वर्गीय पिता रिटायर्ड शिक्षक गोपीलाल जी माहेश्वरी ने आगे बढ़ाया। बमोरी कलाँ और आसपास के दस बारह गाँवों में प्रसिद्ध थे। परन्तु उस जमाने में इस काम के प्रति समाज में उतनी प्रतिष्ठा नहीं होने तथा बमोरी कलाँ में सीमित बिक्री के कारण यह काम परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहों हो सकता था। बाद की पीढ़ी ने इसलिए यह काम बंद कर दिया।