Gsat-7A: भारतीय वायुसेना के लिए क्यों है खास, जानिए

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नई दिल्ली।इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन यानी इसरो अपने अगले कम्यूनिकेशन सैटलाइट Gsat-7A को बुधवार को लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। बताया जा रहा है कि यह सैटलाइट भारतीय वायुसेना के लिए बहुत खास है। आइए, जानते हैं कि सेना के लिए इस सैटलाइट का क्या महत्व है।

Gsat-7A का लॉन्च जीएसएलवी-एफ11 रॉकेट से बुधवार शाम 4:10 बजे श्रीहरिकोटा के लॉन्च पैड से किया जाएगा। जैसे ही यह सैटलाइट जियो ऑरबिट में पहुंचेगा इस कम्यूनिकेशन सैटलाइट के जरिए भारतीय वायुसेना के सभी अलग-अलग ग्राउंड रेडार स्टेशन, एयरबेस और AWACS आपस में इंटरलिंक हो जाएंगे। इससे नेटवर्क आधारित वायुसेना की लड़ने की क्षमता में कई गुणा ज्यादा बढ़ोतरी होगी।

भारतीय वायुसेना के लिए Gsat-7A क्यों है खास?
Gsat-7A से केवल वायुसेना के एयरबेस ही इंटरलिंक नहीं होंगे बल्कि इसके जरिए ड्रोन ऑपरेशंस में भी मदद मिलेगी। इसके जरिए ड्रोन आधारित ऑपरेशंस में एयरफोर्स की ग्राउंड रेंज में खासा इजाफा होगा।

बता दें कि इस समय भारत, अमेरिका में बने हुए प्रीडेटर-बी या सी गार्डियन ड्रोन्स को हासिल करने की कोशिश कर रहा है। ये ड्रोन्स अधिक ऊंचाई पर सैटलाइट कंट्रोल के जरिए काफी दूरी से दुश्मन पर हमला करने की क्षमता रखते हैं।

क्या हैं Gsat-7A के खास फीचर्स?
इस सैटलाइट की लागत 500-800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसमें 4 सोलर पैनल लगाए गए हैं जिनके जरिए करीब 3.3 किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। इसके साथ ही इसमें कक्षा में आगे-पीछे जाने या ऊपर जाने के लिए बाई-प्रोपेलैंट का केमिकल प्रोपल्शन सिस्टम दिया गया है।

Gsat-7A से पहले इसरो Gsat-7 सैटलाइट जिसे ‘रुक्मिणि’ के नाम से जाना जाता है, का लॉन्च कर चुका है। इसका लॉन्च 29 सितंबर 2013 में किया गया था और यह भारतीय नौसेना के लिए तैयार किया गया था। यह सैटलाइट नेवी के युद्धक जहाजों, पनडुब्बियों और वायुयानों को संचार की सुविधाएं प्रदान करता है। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में भारतीय वायुसेना को एक और सैटलाइट Gsat-7C मिल सकता है जिससे इसके ऑपरेशनल आधारित नेटवर्क में और ज्याद बढ़ोतरी होगी।

कितने मददगार हैं सैटलाइट्स?
भारत के पास अभी करीब 13 मिलिटरी सैटलाइट्स हैं। इनमें से ज्यादातर सैटलाइट्स रिमोट-सेंसिंग सैटलाइट्स हैं जिनमें कार्टोसैट सीरीज और रीसैट सैटलाइट्स शामिल हैं। ये धरती की निचली कक्षा में मौजूद रहते हैं और धरती के चित्र लेने में मददगार होते हैं। हालांकि कुछ सैटलाइट्स को धरती की भू-स्थैतिक कक्षा (जियो ऑरबिट) में भी स्थापित किया जाता है।

इन सैटलाइट्स का इस्तेमाल निगरानी, नेविगेशन और कम्यूनिकेशन के लिए किया जाता है। ये रिमोट सेंसिंग सैटलाइट्स भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान भी काफी मददगार साबित हुए थे।

दुनिया में कितने मिलिटरी सैटलाइट हैं मौजूद?
इस समय धरती के चारों और लगभग 320 मिलिटरी सैटलाइट चक्कर काट रहे हैं। इसमें से आधे सैटलाइट केवल अमेरिका के हैं। इसके बाद रूस और चीन के सैटलाइट्स का नंबर आता है। बता दें कि स्पेस में मिलिटरी साजो-सामान तैयार करने के मामले में चीन ने पिछले कुछ सालों में काफी बढ़त बनाई है, इसे देखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। चीन ने तो जनवरी 2017 में धरती की निचली कक्षा में घूमने वाले सैटलाइट के लिए ASAT (एंटी सैटलाइट) वेपन का टेस्ट भी किया था।