लोकसभा चुनाव से पहले कर्ज की ब्याज दरों में नरमी के संकेत

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नई दिल्ली। कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिलने के बाद आप उम्मीद कर सकते हैं कि जल्द ही ब्याज दरों को लेकर भी कुछ राहत भरी खबर मिलेगी। देश की कुछ दिग्गज वित्तीय सलाहकार एजेंसियां मान रही है कि ब्याज दरों में कटौती की शुरुआत लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यानी अगले साल फरवरी में हो सकती है।

ये एजेंसियां देश में महंगाई की दर में लगातार हो रही गिरावट और सरकार व आरबीआइ के बीच बेहतर सामंजस्य बनने की उम्मीद में ऐसा कह रही हैं। कोटक इकोनॉमिक रिसर्च ने ब्याज दरों की भावी गति पर विस्तृत रिपोर्ट में कहा है कि देश में खुदरा और थोक महंगाई दर की स्थिति को देखते हुए ब्याज दरों में 50 आधार अंकों यानी 0.50 फीसद की कमी की सूरत बन रही है।बीते नवंबर में खुदरा महंगाई की दर 2.33 फीसद पर रही थी।

वैसे आरबीआइ ने इस महीने की शुरुआत में मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए अक्टूबर तक की महंगाई दर को केंद्र में रखकर ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला किया था। अक्टूबर में खुदरा महंगाई की दर 3.4 फीसद थी।

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट और खाद्य उत्पादों की कीमतों में नरमी को देखते हुए संभावना है कि अभी थोक व खुदरा महंगाई की दर नीचे की तरफ ही अग्रसर होगी। इस आधार पर ही कोटक इकोनॉमिक रिसर्च ने कर्ज के सस्ता होने की संभावना जताई है।

आरबीआइ सात फरवरी को मौद्रिक नीति की अगली समीक्षा करेगा। पिछले मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान आरबीआइ की तरफ से पेश प्रपत्र भी इस बात की तरफ इशारा करता है कि कर्ज के सस्ता होने का एक चक्र शुरू हो सकता है।

आरबीआइ ने वर्ष की शुरुआत में महंगाई के दर का लक्ष्य चार फीसद तय किया था। अक्टूबर में मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए महंगाई दर के 3.9 से 4.5 फीसद रहने की बात कही गई थी। लेकिन पिछली समीक्षा के दौरान इसे घटाकर 2.8-3.2 फीसद कर दिया है।

जबकि ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि वर्तमान में महंगाई की दर 2.8 फीसद से भी नीचे है। ऐसे में सरकार भी चाहेगी कि ब्याज दरों में कमी हो ताकि आम जनता पर होम लोन व ऑटो लोन जैसे खुदरा कर्ज का ब्याज भार कम हो सके।

एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में भारत में ब्याज दरें चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया समेत अन्य सभी देशों से काफी ज्यादा है। भारत में ब्याज की दरों को चार फीसद सालाना से ज्यादा बताया गया है जबकि चीन में इसके दो फीसद से थोड़ा ज्यादा और मलेशिया व इंडोनेशिया में तीन फीसद सालाना से नीचे बताया गया है।