सोने में निवेश के प्रति आकर्षण घटने से आयात 18 % कम रहने की आशंका

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नई दिल्ली। भारत से सोने प्रति आकर्षण तेजी घटने के संकेत हैं। नई पीढ़ी निवेश के नए रास्ते तलाश रही हैं, जिसके कारण 2018 में पिछले साल के मुकाबले सोने का आयात 18 प्रतिशत कम रहने की आशंका जताई जा रही है। पहले पांच महीनों के दौरान आयात में गिरावट चौंकाने वाली रही है। औसतन 880 टन सालाना आयात की तुलना में इस साल सोने का आयात 720 टन तक सिमट जाने की संभावना है।

‘वर्ल्ड गोल्ड कॉउंसिल’ और ‘इंडियन बुलियन एसोसिएशन’ ने यह अनुमान संयुक्त रूप से देशभर के 12 मुख्य आयातकों के सर्वे, उनकी बिक्री और उनके कुल आयात के आधार पर लगाया गया है। दोनों ही संगठनों से इसके लिए निवेश के नए विकल्प तलाशे जाने को मुख्य कारण माना है।

सोने के आयात में पहले 5 माह यानी जून तक 39 प्रतिशत की कमी आई थी, बावजूद इसके नवंबर तक दीपावली और शादी-ब्याह की शुरुआती ग्राहकी से इसमें काफी सुधार आया है। तुलनात्मक रूप से इसे बेहतर नहीं कहा जा सकता फिर भी उद्योग के नजरिए से सितंबर से लेकर नवंबर के बीच आभूषण करोबार में आई बढ़ोतरी ने काफी हद तक गिरावट कम करने में मदद की है।

खपत कम होने के संकेत
सोने पर 5 प्रतिशत आयात शुल्क की वजह से भी आयात प्रभावित है, बावजूद इसके दूसरे तरीकों से देश में सोने की आवक बढ़ने के संकेत नहीं है। जाहिर है, देश में सोने की खपत होने के संकेत हैं। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सोने को परंपरागत तौर पर भले ही बेहतर निवेश माना जाता हो, लेकिन शेयर बाजार में तेजी और निवेश के नए विकल्प, मुख्य रूप से म्यूचुअल फंडों के प्रति आकर्षण सोने की मांग को फीका कर रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 25-40 वर्ष के नौकरीपेशा लोगों में सोने को केवल आकर्षण की वस्तु माना गया है, जबकि निवेश के लिए अन्य विकल्प चुने जाने की बात सामने आई है। सोने की खरीदी से यह आयु वर्ग अब पूरी तरह बाहर होता जा रहा है।

गहनों की बिक्री घटी
सोने के गहनों की बिक्री में तेज गिरवाट देखी जा रही है। आभूषण के तौर पर सोने की बिक्री में 40 प्रतिशत अधिक कमी आई है। सोने में जो खरीदी देखी जा रही है, उसमें भी बुलियन का हिस्सा 70 प्रतिशत से ऊपर निकल गया है।

ऐसे में आने वाले समय में सोने से तैयार गहनों की स्थनीय बिक्री के बजाय निर्माताओं को इनके निर्यात के लिए बाजार तलाशने पर मजबूर होना पड़ेगा। इस क्षेत्र में भी दुबई और इटली में बने गहनों से पार पाना मुश्किल होता जा रहा है। इन देशों में बनने वाले गहनों में कम सोने और हॉलमार्क होने से भारतीय बाजारों में भी इनके प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है।