क्रिप्टो क्रैश से हफ्ते भर में निवेशकों के करीब 50 लाख करोड़ रुपये डूबे

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नई दिल्ली। बिटकॉइन समेत अन्य क्रिप्टोकरेंसी के लिए यह हफ्ता सबसे बुरा रहा है। निवेशकों को मोटा मुनाफा देने वाली क्रिप्टोकरेंसी (वर्चुअल करेंसी) अब क्रैश हो चुकी है। वर्चुअल करेंसी के तौर पर सबसे अधिक लोकप्रिय रहा बिटकॉइन शुक्रवार को 4,000 डॉलर के नीचे चला गया। दिसंबर 2017 में एक बिटकॉइन की कीमत करीब 20,000 डॉलर थी।

पिछले साल की शानदार रैली के बाद अब तक क्रिप्टोकरेंसी में 700 अरब डॉलर (करीब 50 लाख करोड़ रुपये) स्वाहा हो चुके हैं। पिछले एक हफ्ते में यह आई अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। ब्लूमबर्ग के गैलेक्सी क्रिप्टो इंडेक्स में इस दौरान करीब 23 फीसद से अधिक का गोता लगाया है।

हालांकि दुनिया के अधिकांश देशों में इस पर पाबंदी होने की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव सीमित रहने की उम्मीद है। क्रिप्टोकरेंसी पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में यह गिरावट जारी रहेगी। पिछले एक महीने में बिटकॉइन की कीमत में 30 फीसद की गिरावट आई है, जबकि पिछले छह महीनों में यह गिरावट 50 फीसद है।

वहीं दिसंबर के बाद से देखा जाए तो इसकी कीमत 80 फीसद तक टूट चुकी है। भारतीय रुपये में अभी एक बिटकॉइन की कीमत करीब 2 लाख 98 हजार रुपये हैं। आने वाले दिनों में इसकी कीमत में और भी गिरावट की उम्मीद है।

क्यों गिर रही हैं कीमतें?
दुनिया में इस करेंसी को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं। इस करेंसी के साथ सबसे बड़ी समस्या इसके नियमन को लेकर है। दुनिया में कोई भी एजेंसी इसे रेग्युलेट नहीं करती है और इस वजह से भारत समेत दुनिया के कई देशों ने इस करेंसी में होने वाली लेन-देन पर रोक लगा रखी है।

दूसरा बड़ा कारण इंटरनेट की दुनिया में बिटकॉइन का वर्चस्व कम होना है। किसी जमाने में वर्चुअल करेंसी के तौर पर बिटकॉइन का दबदबा था लेकिन अब कम से कम ऐसी 700 से अधिक करेंसी इंटरनेट की दुनिया में चलन में है। दिग्गज कंपनियों में अगर बात की जाए तो माइक्रोसॉफ्ट इस करेंसी में लेन-देन करती है।

हालांकि अधिकांश तौर पर इस करेंसी का इस्तेमाल निवेश के लिए ही किया जाता रहा है। पिछले एक दशक में इस करेंसी में निवेश करने वालों को उम्मीद से अधिक मुनाफा हुआ लेकिन पिछले एक साल में इसमें निवेश करने वालों की रकम करीब 80 फीसद तक डूब चुकी है।

क्या है बिटकॉइन?
इस करेंसी को वर्चुअल वर्ल्ड में चलन में लाने का श्रेय सातोशी नाकामोतो समूह को जाता है, जिसने 2009 में इसकी शुरुआत की। यह पूर्ण रूप से डिजिटल करेंसी है। साफ शब्दों में समझा जाए तो इसका इस्तेमाल केवल इंटरनेट पर किया जा सकता है। आम तौर पर इसे पारंपरिक मुद्रा का विकल्प समझा जाता है।

हालांकि दोनों में नियमन (रेग्युलेशन) का फर्क है। पारंपरिक मुद्राओं को जहां हर देश की सरकारें नियमित करती हैं वहीं इस करेंसी को कोई भी संस्था रेग्युलेट नहीं करती है। यही वजह है दुनिया की अधिकांश सरकारों ने अपने लोगों को इस करेंसी में लेन-देन या निवेश पर रोक लगा रखी है।