मजदूर का बेटा कालूराम बनेगा गांव का पहला डॉक्टर

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विपरीत हालातों के बावजूद की तैयारी और नीट में सफलता पाई

कोटा। लक्ष्य पर डटे रहें और नियमित मेहनत जारी रहे तो मंजिल मिल ही जाती है। यही कर दिखाया है बारां जिले के छीपाबड़ौद क्षेत्र के गांव कालपा जागीर के छात्र कालूराम लववंशी ने। परिवार की तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कालूराम ने पढ़ाई जारी रखी, अब गांव का पहला डॉक्टर बनेगा।

डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाला कालूराम परिवार और गांव का नाम रोशन करना चाहता है। परिवार बीपीएल श्रेणी में आता है। पिता रत्तीराम ट्रैक्टर चालक व नरेगा मजदूर हैं तथा कक्षा 4 तक ही पढ़े हैं। मां धापू बाई दिहाड़ी व नरेगा मजदूर हैं और निरक्षर है।

पारिवारिक स्थितियों को देखते हुए 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद वर्ष 2016 में राजकीय महाविद्यालय कोटा में बीएससी बॉयोलॉजी में एडमिशन ले लिया, लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा देने का संकल्प मन में था।

इसलिए एक बार कोचिंग में पढ़ाई करते हुए परीक्षा देने का निर्णय लिया। पिता से भी चर्चा हुई और एडमिशन ले लिया। इसलिए वर्ष 2017 में नीट की तैयारी कराने के लिए पिता रत्तीराम ने शुल्क की व्यवस्था की। पारिवारिक स्थितियों और कालूराम की पढ़ाई के प्रति लगन को देखते हुए कोचिंग  इंस्टीट्यूट ने भी मदद की और शुल्क में 40 प्रतिशत की रियायत दी।

शेष राषि की व्यवस्था पिता रत्तीराम ने की। कालूराम ने दिन-रात पढ़ाई की और खुद को साबित कर दिखाया। मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट 2017 में ओवरआल रैंक 7972 और ओबीसी कैटेगरी में 2746वीं रैंक हासिल की। कालूराम ने एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बिहार के नालंदा स्थित वर्द्धमान मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया है।

शुरू से पढ़ाई में होनहार कालूराम ने 10वीं में 83 प्रतिशत और 12वीं कक्षा में 89 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। कोचिंग की पढ़ाई के साथ-साथ कालूराम ने कॉलेज की पढ़ाई भी की और बीएससी सैकेंड ईयर की पढ़ाई पूरी की। अब गांव का पहला युवा होगा, जो चिकित्सक बनने जा रहा है। कालूराम की प्रतिभा को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के दौरान भी प्रतिमाह स्कॉलरशिप देने का निर्णय लिया।

तीन बीघा जमीन, वो भी गिरवी रखी
कालूराम का परिवार बीपीएल श्रेणी में आता है। गांव में कच्चा घर है। परिवार के गुजारे के लिए मात्र तीन बीघा जमीन है, जिससे बमुश्किल खाने जितना अनाज पैदा हो पाता है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए पिता ने रात-दिन दूसरे का ट्रैक्टर चलाकर दिहाड़ी मजदूरी की। मां कई सालों से बीमारी से जूझ रही है, बावजूद इसके मजदूरी की। कुछ जमीन गिरवी रख पिता ने पैसों की व्यवस्था कर कालूराम को कोटा पढ़ने भेजा।

खुद बनाया खाना, फ्री में मिला मकान
कोटा में कोचिंग इंस्टीट्यूट के साथ-साथ मकान मालिक ने भी सहयोग किया। कालूराम की स्थिति को देखते हुए मकान मालिक के एल वर्मा ने पूरे साल फ्री में रहने की सुविधा दी। कोटा आने के बाद शुरू में करीब 10 दिन मैस से खाना मंगाया, लेकिन महंगा पड़ा। इसलिए खुद ही खाना बनाना शुरू कर दिया। कालूराम से प्रेरित होकर छोटा भाई नरेश लववंशी भी कोटा में रहकर इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है।

ऐसे विद्यार्थी प्रेरित करते हैं
विपरीत आर्थिक हालातों में मेहनत कर आगे बढ़ने वाले ये विद्यार्थी अन्य विद्यार्थियों को भी प्रेरित करते हैं। इंस्टीट्यूट हमेशा ऐसे विद्यार्थियों की मदद कर उन्हें प्रोत्साहित करता रहेगा।

नवीन माहेश्वरी, निदेशक, एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट