ड्राइवर पिता, नरेगा मजदूर मां के बेटे बनेंगे डॉक्टर, इंजीनियर

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कोटा। हर पिता अपने पुत्र को स्वयं से आगे बढ़ते देखना चाहता है, पिता का सपना होता है कि पुत्र नई ऊंचाइयां छुए। इसी तरह मां का जीवन भी बच्चों को ही समर्पित होता है। कोचिंग नगरी कोटा ने एक ड्राइवर पिता और एक नरेगा मजदूर मां का सपना पूरा किया है। दिन-रात सड़कें नापते पिता, गर्मी में नरेगा में पसीना बहाती मां ने विपरीत परिस्थितियों में बच्चों की पढ़ाई करवाई।

मेहनत का परिणाम यह आया है कि एक बेटा सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करेगा तथा दूसरा आईआईटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करेगा। जोधपुर जिले की बाप तहसील के कानासर गांव में ईसरगो की ढाणियां के निवासी इस परिवार में इन दिनों खुशियां हैं। घर के मुखिया ट्रक ड्राइवर मगनाराम के बेटे महेन्द्र ने नीट और श्याम सुंदर ने जेईई-एडवांस्ड में क्वालीफाई कर लिया है।

एक डॉक्टर बनेगा और दूसरा इंजीनियर
दोनों बेटों श्याम सुन्दर व महेन्द्र कुमार को मगनाराम ने पैसे उधार लेकर इंजीनियरिंग व मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने गत वर्ष में कोटा भेजा। यहां दोनों भाईयों ने कोचिंग में लक्ष्य प्रप्ति के प्रति दृढ़ संकल्प लेकर कड़ी मेहनत की। महेन्द्र गांव का पहला छात्र होगा जोकि डॉक्टर बनेगा, श्याम सुन्दर भी गांव का पहला छात्र होगा जो आईआईटी से इंजीनियरिंग करेगा।

महेन्द्र कुमार ने नीट 2018 में 545 अंक हासिल कर ऑल इंडिया 8592वीं रैंक व कैटेगरी में 5541वीं रैंक प्राप्त की है। इसी प्रकार श्याम सुन्दर ने जेईई-एडवांस्ड में 15949 रैंक प्राप्त की।

पिता ट्रक ड्राइवर तो मां नरेगा मजदूर
मगनाराम ने बताया कि परिवार में तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा सुरेन्द्र जोधपुर से बीएड कर रहा है। मैं खुद तो 10वीं पढ़ा हुआ हूं, पत्नी चन्द्रादेवी चौथी पास है। जमीन है लेकिन सूखा क्षेत्र होने से बंजर है। परिवार चलाने के लिए 12 हजार रुपए प्रतिमाह की पगार पर ट्रक चलाता हूं।

तीनों बच्चे पढ़ाई में होशियार हैं, पढ़ाई करवाना आसान नहीं था, ऐसे में पत्नी चन्द्रा देवी ने नरेगा के तहत मजदूरी की। फीस के लिए कर्ज लेकर दो बेटों को कोटा पढ़ने भेजा। यहां दोनों भाईयों की प्रतिभा को देखते हुए कोचिंग संस्थान ने फीस में रियायत देकर हौसला बढ़ाया। महेन्द्र कुमार ने 12वीं कक्षा में 90 फीसदी व श्याम सुंदर ने 88 फीसदी अंक प्राप्त किए थे। मगनाराम ने बताया कि इस बार यदि ये परिणाम नहीं आते तो शायद अगले वर्ष की पढ़ाई नहीं करवा सकता था।

किराये और खाने में भी मदद
श्याम सुन्दर ने बताया कि कोटा में हम दोनों भाई किराये का कमरा लेकर रहते थे। हमारी स्थिति को देखते हुए मकान मालिक ने किराये में छूट दी। दो साल से नए कपड़े नहीं खरीदे। सिर्फ साल में एक बार दीवाली पर घर जाते थे। पढ़ाई के अलावा खाने का खर्चा भी था, ऐसे में मैस संचालक ने दोनों भाईयों में से एक को निशुल्क खिलाया।