इंजीनियर्स सही बात को कहने से न चूकें

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कोटा । जल ग्रहण एवं मृदा संरक्षण विभाग राजस्थान के पूर्व निर्देशक सुमेर सिंह ने कहा है कि अभियंताओं को सही बात को कहने से कभी चुकना न नहीं चाहिए। चाहे उसे परिणाम कुछ भी हों। वरिष्ठ अभियंता सुमेर सिंह शनिवार को जल ग्रहण विकास पर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स द्वारा आयोजित दो दिवसीय सेमीनार के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि वर्षा जल प्रबंधन एवं जलग्रहण विकास में ग्रामीणों का परम्परागत ज्ञान भी हमें मदद करता है। उन्होंने माही परयिजना में अपने राजकीय सेवाकाल के कड़वे अुनभव भी बताए। कृषि मंत्रालय भारत सरकार के अतिरिक्त आयुक्त सीएम पांडे ने रिमोट सेंसिंग, केचमेंट सर्वे तथा जिओ तकनीक आदि को कब कैसे उपयोग में लाने के तरीके बताए। कहा कि वर्षा की हर बूंद से अधिक अधिक से अधिक उपज लेने का काम जल संरक्षण से ही संभव है।

इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के अध्यक्ष सीकेएस परमार ने कहा कि समाज में अभियंताओं की प्र्रतिष्ठा कम नहीं होने पाए, इसके लिए संघर्ष करना पड़े तो भी करें। राज्य में प्रथम कृषि अभियंता एवं विश्व बैंक परियोजना की अधिकारी अंजु गौडत्र ने कहा कि पानी की उपलब्धता होने पर जल ग्रहण रचना काम आएगी।

आज के समय में निरंतर पानी कम होता जा रहा है और जल स्त्रोत सूखते जा रहे है। यह हम सबके लिए चुनौती है। पूर्व खनिज अभियंता एससी अग्रवाल ने खनन क्षैत्रों से निकले मलबे को रेत के विकल्प के रूप में काम में लेने का सुझाव दिया तथा खनन के पानी के सदुपयोग पर जोर दिया।

– इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम पर्यावरण के अनुकूल हो
जल बिरादरी के प्रदेश उपाध्यक्ष बृजेश विजयवर्गीय ने कहा कि इंजीनियरिंग की शिक्षा में पर्यावरण कहीं खो गया है। कोटा के संदर्भ में बाढ़ नियंत्रण के लिए डायवर्जन चैनल जल विशेषज्ञों की राय को दर किनारे कर के बनी, जबकि इसके स्थान पर वर्षा जल संग्रहण का काम हो सकता था।

चम्बल में प्रदूषण रोकने के लिए शुद्धिकरण की योजना भी सही इंजीनिरिंग के अभाव में लम्बित है। गलत इंजीनिरिंग की भ्रष्टाचार का टूल बन गई है। पाठ्यक्रम में ही बदलाव की जरूरत है। सेमीनार में कृषि विभाग के संयुक्त निर्देशक पी के गुप्ता ने कहा कि नहर परियोजना में पानी की बर्बादी हो रही है।

उन्होंने फार्म पौण्ड बनाने की वकालात की। नाबार्ड़ के राजीव दायमा ने प्राकृतिक संसाधानों व कृषि में एकीकृत जल ग्रहण पर व्याख्यान दिया। शोध छात्रा उपमा शर्मा एवं नेहा सक्सेना तथा अंकिता मिश्रा ने अच्छी वर्षा वाले स्थानों पर जल ग्रहण ढांचे बनाने पर विस्तृत चर्चा की।

गंगानगर के अभियंता बलमीत सिंह नहरी जल के सदुपयोग के सुझाव दिए। उत्तराखण्ड के केपी त्रिपाठी ने कहा कि जल ग्रहण के बारे में जो जानते है वहीं बताया जाए। सेमीनार में तकनकी सत्र के कंवीनर अनंद बर्दवा ने कहा कि इंजीनियरिंग का उजला पक्ष भी है जिस पा गर्व किया जा सकता है।

सीएडी परियोजना के पूर्व वरिष्ठ अभियंता कैलाश भार्गव ,वरिष्ठ अभियंता ओपी माथुर,धीरेंद्र माथुर ,संजीव सब्ब्रवाल के अलावा मुकेश सुमन, भवानी शंकर मीणा ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए। संचालन सचिव जसमत सिंह ने किया। समापन सत्र में सुमेर सिंह व अतिथियों को सीकेएस परमार ने सम्मानित किया। प्रजेंटेशन देने के लिए अंकिता मिश्रा,नेहा सक्सेना, बृजेश विजयवर्गीय,डॉ सुसेन राज आदि को भी स्म्ृति चिन्ह से सम्मानित किया। इंस्टीट्यूट के डीसी गुप्ता ने अतिथियों का अभार जताया।