जिसने हमें ‘भागवान’ बनाया, उसी ‘भगवान’ को हम भूल रहे- पं.नागरजी

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कल्याणपुरा में श्रीमद् भागवत कथा सुनते श्रद्धालु।

विराट धर्मसभा : कल्याणपुरा में गौसेवक संत पं.नागरजी ने कहा कि चित्तौड़ की भूमि से मीरा ने एक प्रेरक संदेश दिया था- मेरा गिरधर से कभी संपर्क नहीं टूटे। लेकिन जिसने हमें छप्पर फाड़ कर दिया, आज उसके लिए हम मुंह नहीं खोल रहे

अरविंद, कोटा। दिव्य गौसेवक संत पूज्य पं.कमल किशोर ‘नागरजी ने कहा कि आज हम धन और वैभव की दौड़ में अपने मुकाम को भूलते जा रहे हैं। हमें सोना-चांदी, लेन-देन सब याद हैं लेकिन जिसने हमें भाग्यवान बनाया, उस भगवान का नाम लेने के लिए हमारे पास समय नहीं है। जीते-जी हमारे पास मंदिर या सत्संग में जाने का समय नहीं है तो मरने के बाद कौन देगा हमें समय।

सोमवार को कोटा-चित्तौड़गढ़ फोरलेन राजमार्ग पर कल्याणपुरा में श्रीमद् भागवत कथा के पहले दिन धाराप्रवाह प्रवचन में उन्होंने कहा कि हमारे शरीर में काम, क्रोध, लोभ की पैदावार रोज होती है। इसमें लोभ अंत तक बना रहता है। ये ऐसे सूतक है जो घरों में पूजा को बंद कर देते हैं, हमें ईश्वर के द्वार तक पहुंचने नहीं देते।

ऐसी रूकावटें आएं तब प्रार्थना व भक्ति ईश्वर के दरबार में एक अर्जी है। कथा उसकी एक पाती है, जब भी समय मिले, इसे सुन लें और पढ़ लें। कथा-सत्संग के बिना ईश्वर का जीव से सम्पर्क टूट जाता है। इसलिए सत्संग के तारों से जुडे़ रहें।

खचाखच भरे विशाल पांडाल में एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पांडव श्रीकृष्ण से जीवंत सम्पर्क में रहे, इसलिए कौरव हारे। सीता लंका में पवनसुत हनुमान से सतत संपर्क में रही, इसलिए रावण का अंत हुआ।

संतों के सत्संग में हवा का एक-एक झांका आपको पवित्र संदेश देता है, जिससे देह पवित्र होती है। इस पवित्र देह में कोई सांसारिक खराबी न आने दें। कथा की भक्ति में शक्ति हो तो उसमें जनता ही नहीं, जनार्दन भी आते हैं।

धन एवं वैभव की दौड़ में हम ईश्वर को भूल रहे
उन्हांने कहा कि हम घर में यह तो ढूंढते हैं कि सोना-चांदी, नकदी पर्याप्त है या नहीं, लेकिन घर में ईश्वर है या नहीं, यह खोजना भूल रहे हैं। 12 माह में हमने सब कुछ किया लेकिन कोई अच्छा कार्य नहीं हुआ तो घर में ‘सब है’ कहना अर्थहीन है।

धन, पुत्र या सुख प्राप्त न हो तो पछताना मत क्यांकि इनमें हम भाग्यशाली नहीं बनते। क्यांकि घर में ईश्वर नही हैं तो सब बेकार है। ध्यान रहे, पुत्र प्राप्ति भले ही न हो, लेकिन भगवत प्राप्ति जरूरी है।

सपने या संकट में ईश्वर बोलते हैं
‘अनहद नाद’ से ब्रह्म ज्ञान की व्याख्या करते हुए पूज्य नागरजी ने कहा कि भजनों में स्वर से पता चलता है कि ये अनहद नाद बोल रहे हैं। सपने में या संकट में जिसने आपकी मदद की, वही ईश्वर है। आपको सुनाई दे तो आप ईश्वर के कृपा पात्र बन जाते हो।

हमारा अंतःकरण शुद्ध होगा तो ब्रह्म ज्ञान को हम महसूस करने लगेंगे। निर्दोष व निष्पाप होकर खुद ईश्वर से मिलने का अनुभव करो। उन्होंने तीन सूत्र देते हुए कहा कि हमेशा प्रणम्य रहो, प्रणाम भाव में रहना ही पूजा-अनुष्ठान है। दूसरा, पाप करने पर ईश्वर से क्षमा मांगना सीखो। तीसरा, जिसने हमें भागवान बनाया, उस भगवान को रोज याद करो।

जिसने छप्पर फाड़कर दिया, उसके लिए मुंह नहीं खुल रहे
अंत में अपनी ओजस्वी वाणी में उन्होंने हजारों भक्तों को जीवन की सच्चाई से साक्षात कराया। वे बोले, जिस ईश्वर ने हमें छप्पर फाड़ कर दिया और हम भाग्यवान हो गए। उसके भगवान का नाम लेने के लिए हमारे मुंह नहीं खुल रहे।

शिवालय हो या मंदिर उनमें पानी टपकता है, दीवारें टूटती हैं, उनकी मदद के लिए हमारा मुंह नहीं खुलता। अच्छाई के लिए अपना मुंह खुला रखो, क्यांकि परोपकार की गति हमेशा अच्छी होती है।

जब भाग्यवान होकर भी हमारा मुंह पूजाघर की बजाय बाथरूम में जाकर खुले तो जीवन नरक समान है। उन्होंने कहा कि प्रार्थना करो कि जन्म भले कहीं भी हों, लेकिन मरण तो ईश्वर के पूजा घर में हो।

कथा सूत्र –

  • घर में अपनी इच्छा को शून्य करोगे तभी राम की इच्छा प्रकट होगी।
  •  जिसमें अति हो जाती है, उसमें मति काम नहीं करती।
  • भैंस दूध देती है जबकि गाय अमृत देती है, इसीलिए प्रसव के सवा माह बाद तक अमृत काम में नहीं लेते।
  • व्यस्त हूं, कहकर ईश्वर से दूरी मत बढ़ाओ। कथा कलह में धैर्य और साहस देती है।
  •  जब भी ज्यादा कष्ट हों तो लंबी सांस लेकर ‘हे राम’ बोलकर देखो। यही सांस आपकी गुरू है।