घर खरीदारों के पक्ष में अब बदला दिवालियापन कानून

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नई दिल्ली। इन्सॉल्वंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया ने नियमों में बदलाव करते हुए यह दर्शाना अनिवार्य कर दिया है कि किसी कंपनी के रेजॉलुशन प्लान में सभी पक्षों के हितों का ध्यान कैसे रखा जाएगा। यह कदम उठाने का मकसद जेपी इन्फ्राटेक एवं आम्रपाली ग्रुप की कुछ रियल एस्टेट कंपनियों के घर खरीदारों के हितों का संरक्षण करना है।

पिछले सप्ताह इन्सॉल्वंसी और बैंकरप्सी प्रोसिगडिंग्स के रेग्युलेटर की ओर से संशोधित नियम का नोटिफिकेशन जारी किया गया। इस संशोधन से यह सुनिश्चित होगा कि बैंक और लोने देनेवाले अन्य संस्थान कार्रवाई से प्रभावित दूसरे स्टेकहोल्डर्स के हितों की शर्त पर अपने हित नहीं साधकर नहीं बच सकते।

बैंक क्रेडिटर्स कमिटी का हिस्सा होते हैं जिनकी किसी कंपनी के बैंकरप्ट होने के प्रक्रिया में महत्वपूर्ण नीति-निर्माता की भूमिका होती है। बैंकरप्सी केस के स्पेशलिस्ट एक वकील ने बताया, ‘नियमों में बदलाव से एक गैप भर गया है क्योंकि फ्लैलट बायर्स को लग रहा था कि उनके हितों के संरक्षण के लिए नजरिए से इसमें कुछ भी नहीं है।’

पिछले साल अस्तित्व में आया नया कानून रेजॉलुशन प्रोसेस को 180 दिनों में निपटाने की व्यवस्था करता है जिसमें अधिकतम 90 दिनों की बढ़ोतरी हो सकती है। इस प्रक्रिया में इनसॉल्वंसी रेजॉलुशन प्रफेशनलों की नियुक्ति की जाती है जिनपर कंपनी के संचालन और योजना निर्माण की जिम्मेदीरी होती है।

कानून के तहत अगर क्रेडिटर्स कमिटी की सहमति हो तो वह दूसरी कंपनियों से आवेदन मंगवा सकती है जो इन्फर्मेशन मेमोरेंडम फाइनलाइज करने के बाद रेजॉलुशन प्रोसेस से गुजर रही कंपनी का टेक ओवर करने का इच्छुक हो।

इन्सॉल्वंसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि कानून के तहत कॉर्पोरेट कर्जदार (कंपनी) और इसके स्टाफ, मेंबर्स, क्रेडिटर्स, गारेंटर्स और अन्य स्टेकहोल्डर्स रेजॉलुशन प्लान में शामिल होते हैं।

लेकिन, पहले के नियम में फाइनैंशल क्रेडिटर्स (बैंक) और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स (वेंडर्स एवं वे सभी जिनका कंपनी पर बकाया है) को छोड़कर अन्य पक्षों के हितों की अनदेखी हुई थी।

संशोधित नियमों में मिली सहूलियतों के मद्देनजर नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल मिली बोलियों के आधार पर फाइनल रेजॉलुशन प्लान पर फैसला लेगा। एक वकील ने कहा, ‘ट्राइब्यूनल सभी पक्षों को सूचित किए बिना रेजॉलुशन प्लान क्लियर नहीं करेगा और उस वक्त फ्लैट बायर्स आपत्तियां दर्ज करवा सकते हैं।’