नंदन नीलेकणी फिर बनेंगे इन्फोसिस के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष

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नीलेकणी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और उन्होंने 2 महीने के अमेरिकी दौरे को स्थगित कर दिया है

नई दिल्ली। इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी एक बार फिर इन्फोसिस के गैर कार्यकारी अध्यक्ष बन सकते हैं। इस मामले से जुड़े कई सूत्रों ने  यह जानकारी दी है। बताया जा रहा है कि नीलेकणी इस पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और उन्होंने 2 महीने के अमेरिकी दौरे को स्थगित कर दिया है। वह बेंगलुरु में ही रहकर चर्चा और मंथन करेंगे।

इस मामले के एक जानकार ने बताया, ‘उन्हें अभी भी अपना मन बनाना है, लेकिन संभावना है कि ऐसा होगा। वह गंभीरता से इस पर विचार कर रहे हैं। लेकिन वह गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर लौटेंगे, ऑपरेशंस या बिजनस रोल में नहीं।’

एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि नीलेकणी की वापसी के साथ ही इन्फोसिस बोर्ड में भी बड़ा बदलाव दिखेगा। कम से कम चार सदस्यों पर इस्तीफे का दबाव बढ़ रहा है। इनमें चेयरमैन आर. शेषशायी, को-चेयरमैन रवि वेंकटेश, ऑडिट कमिटी के चेयरपर्सन रूपा कुडवा और जेफ लेहमन शामिल हैं।

कुछ अडवाइजरी फर्में, पूर्व सीईओ और को-फाउंडर नंदन निलेकणी से गैर-कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका में लौटकर सारे पचड़े को खत्म करने की सलाह दे चुके हैं। निलेकणी ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) जॉइन करने के लिए जून 2009 में इस्तीफा देने के बाद से इन्फोसिस से लगातार दूरी बना रखी है।

माना जाता है कि जब मूर्ति साल 2013 में जब दोबारा कंपनी में लौटे तो उन्होंने निलेकणी को भी ऐसा करने के लिए कहा, लेकिन वह नहीं माने। इन्फोसिस के संस्थागत निवेशकों का प्रतिनिधत्व करने वाले करीब 12 कोष प्रबंधकों ने नंदन नीलेकणि को इन्फोसिस के निदेशक मंडल में वापस लाने का सुझाव दिया है।

कोष प्रबंधकों का कहना है कि इससे अंशधारकों का भरोसा फिर कायम किया जा सकेगा और कंपनी के संकट को हल किया जा सकेगा। यह नीलेकणि को वापसी की वकालत करने का दूसरा मौका है। इससे पहले निवेश सलाहकार कंपनी आईआईएएस ने कहा था कि नीलेकणि को कंपनी के गैर कार्यकारी चेयरमैन के रूप में वापस लाया जाना चाहिए।

नीलेकणी मार्च, 2002 से अप्रैल, 2007 तक कंपनी के सीईओ रहे थे। पिछले सप्ताह इन्फोसिस के पहले गैर-संस्थापक सीईओ बने विशाल सिक्का ने अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद लगातार दो सत्रों में कंपनी का शेयर 15 प्रतिशत टूट गया था और उसके बाजार पूंजीकरण में 34,000 करोड़ रुपये की कमी आई थी।