बिना सरकारी नियंत्रण के चल रहे कोचिंग संस्थान, अभिभावकों की कट रही जेब

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-दिनेश माहेश्वरी 

कोटा ।  मेडिकल और इंजिनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए विद्यार्थी कोचिंग क्लासेज में पढ़ने के लिए मजबूर हैं।  अभिभावक चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी पढ़ाई कर डॉक्टर-इंजीनियर बने। उन्हें मजबूरन अपने बच्चों को कोचिंग क्लासेस में पढ़ाना पड़ता है। क्योंकि स्कूलों में पढाई नहीं होती है।  

में हाल ही में  इस संदर्भ में गरीब और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से Len-den News ने बातचीत , तो उन्होंने पाठ्यक्रम से लेकर स्कूल में पढ़ाई तक आने वाली कई समस्याएं गिनाईं, जिन पर सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

सीबीएसई के समकक्ष नहीं है  पाठ्यक्रम

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का पाठ्यक्रम अच्छा है। इससे संलग्न स्कूलों में यह पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। कई राज्यों ने ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम सीबीएसई के समकक्ष बनाए हैं। इसलिए वहां के विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में दिक्कत नहीं होती है। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं में अधिकांश विद्यार्थी पिछड़ जाते हैं।

इसे ध्यान में रखते हुए अब अभिभावक मजबूरन अपने बच्चों को राष्ट्रीय स्तर की जेईई और एनईईटी जैसे परीक्षाओं के लिए कोचिंग क्लासेज में पढ़ाते हैं। कोचिंग क्लास वाले इसी का फायदा उठाते हुए मोटी फीस वसूल रहे हैं। साथ ही अच्छी तैयारी कराने के नाम पर कई आकर्षक पैकेज बनाए हुए हैं। ये पैकेज नौवीं से बारहवीं कक्षा तक तैयारी कराने के नाम पर बनाए गए हैं। 

 लाखों खर्च क्यों करता

एक अभिभावक ने कहा कि उनकी बेटी इस साल बारहवीं में गई है। हमें उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत चिंता हैं। इसलिए ग्यारहवीं से ही उसे कोचिंग क्लासेज में डाल दिया था। अगर यही पढ़ाई जूनियर कॉलेजों में होती, तो कोचिंग क्लासेज पर लाखों रुपये खर्च क्यों करने पड़ते। हमारी जितनी साल भर की कमाई है, कोचिंग क्लासेज की फीस उससे कहीं अधिक है। बच्चे की पढ़ाई के लिए कर्ज लेकर फीस भरनी पड़ी है।

सरकार भी जिम्मेदार 

 स्टेट बोर्ड की दसवीं कक्षा का नतीजा घोषित होने के बाद विद्यार्थियों में नामचीन कॉलेजों में दाखिले का बहुत क्रेज होता है। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह क्रेज दर्शाता है कि दाखिला लेते समय विद्यार्थी कॉलेजों पर पूरा भरोसा जताते हैं। लेकिन पढ़ाई शुरू होने पर उनका भरोसा उठ जाता है और वे कोचिंग क्लासेज में नाम लिखा लेते हैं। जिसके चलते कोचिंग क्लासेज का व्यवसाय तेजी से फल-फूल रहा है। इसके लिए सरकार भी जिम्मेदार है।

सरकार तय करे एक पाठ्यक्रम

एनईईटी की परीक्षा देने वाली पूजा ने कहा कि जब हमें मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए सीबीएसई पाठ्यक्रम को पढ़ना ही है, तो उसी पाठ्यक्रम को स्टेट बोर्ड में भी पढ़ाना चाहिए। ऐसे में सरकार को स्टेट बोर्ड के पाठ्यक्रम को सीबीएसई के समकक्ष बना देना चाहिए था। सरकार की वजह से विद्यार्थियों को मेडिकल, जेईई मेन व अडवांस परीक्षा के लिए शत-प्रतिशत कोचिंग क्लासेज पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

कोचिंग संस्थानों और स्कूलों में सांठगांठ 

शहर में अधिकतर बड़े कोचिंग क्लासेज वालों की स्कूलों से सांठगांठ है। वे विद्यार्थियों से उन्हीं कॉलेजों में ऑनलाइन ऐडमिशन के लिए कहते हैं, जिनसे उनकी सांठगांठ रहती है। इससे क्लासेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को नियमित रूप से कॉलेज नहीं जाना पड़ता है। इसके एवज में कॉलेज वालों को एकमुश्त बड़ी रकम मिलती है। इससे स्कूलों और कोचिंग क्लासेज दोनों का स्वार्थ सध जाता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों को नुकसान उठाना पड़ता है।