लहसुन के गिरते दामों ने किसानों को रुलाया

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कोटा। किसी ने बटाई पर जमीन लेकर तो किसी ने अपने खेत में बीघा-दो बीघा में लहसुन की खेती कर भाग्य आजमाया, लेकिन जब फसल हाथ आई तो भाव सुनकर ही किसान के पैरों तले जमीन खिसक गई। लहसुन की फसल मंडी में बेची तो मुनाफा निकलना तो दूर, खर्चा भी पूरा नहीं हो पा रहा।

ऐसे में अब लहसुन उत्पादक किसान किस्मत को कोसता हुआ नजर आ रहा है। कोटा थोक फल सब्जीमंडी में लहसुन बेचने आए हाड़ौती के एक दर्जन सीमांत, लघु सीमांत, मध्यम स्तर के किसानों से बात की। किसानों ने मांग की है कि किसान को बचाना है तो सरकार को बाजार हस्तक्षेप योजना जल्द शुरू करनी होगी। नहीं तो कर्ज के बोझ के तले दबे किसानों को इस साल भी मौत को गले लगाने पर मजबूर होना पड़ेगा।

कैसे चुकेगा ब्याह का कर्जा
बटाई के 25 बीघा में लहसुन की खेती की। फसल अच्छी थी, दो माह पहले भाव ठीक ही थे। सोचा बेटे का ब्याह तो ठीक ठाक हो जाएगा। जैसे तैसे जुगाड़ कर बेटे का ब्याह कर दिया। आज ही तीन बीघा का 40 कट्टे लहसुन बेचने आया हूं, जो 1650 रुपए प्रति क्विंटल बिका।

इस भाव में तो जमीन का किराया, खुद की मजदूरी तो दूर खर्चा भी नहीं निकलेगा। अगर पूरा लहसुन इसी भाव में बिका तो कैसे ब्याह का कर्जा चुकेगा। समझ में नहीं आ रहा।
रामगोपाल मेहता, दिल्लीपुरा (सांगोद)

अब नहीं करूंगा खेती
अब तक जमीदारों के यहां मजदूरी करता था। पहली बार 30 हजार रुपए में 4 बीघा जमीन बटाई पर ली। 40 हजार रुपए ही खेती में लग गए। गांव से कोटा लहसुन लाने के 4 हजार रुपए भाड़ा लग गया। यानी 4 बीघा लहसुन की खेती में 74 हजार रुपए तो लग गए और 40 कट्टा लहसुन निकला, जो 1715 रुपए प्रति क्विंटल बिका। ऐसे भाव में तो मूल रकम ही पूरी नहीं हो पा रही। ऐसी खेती करने से क्या फायदा। अब दुबारा कभी खेती नहीं करूंगा।
– हरीशचंद, दुबड़ी, (श्योपुर)

खाने के लिए खरीदने पड़ेंगे गेहूं
आठ बीघा जमीन है। पड़ोसी किसान को देख मैंने भी दो बीघा में लहसुन कर लिया। जिसमें 13 कट्टे लहसुन निकला। अगर गेहूं करता तो 40 कट्टे निकलता। कम से कम घर का गेहूं तो खाता। पड़ोसी के चक्कर इस साल गेहूं भी नहीं कर पाया। अब इस साल खरीदकर गेहूं खाना पड़ेगा।
छीतर मेघवाल, सहगांवदा, (तालेड़ा)