मौद्रिक नीति समिति महंगाई को लेकर जोखिम उठाने को तैयार नहीं

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नई दिल्ली । पिछले वर्ष मौद्रिक नीति तय करने की नई व्यवस्था लागू की गई थी तब यह माना गया था कि अब सरकार की मंशा के मुताबिक कदम उठाना आसान होगा। लेकिन तकरीबन एक साल का अनुभव इसे गलत साबित करता है।

मौद्रिक नीति तय करने के लिए गठित छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) महंगाई को लेकर आगे भी कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। संकेत हैं कि समिति अगली बैठक में भी शायद ही रियायत देने को तैयार हो।

केंद्रीय बैंक ने चार अक्टूबर, 2017 को मौद्रिक नीति की घोषणा से पहले हुई एमपीसी की बैठक का ब्यौरा सार्वजनिक किया है जिसमें सदस्यों के बीच मतभेद सामने आया है।

सरकार की तरफ से नामित एक सदस्य रविंद्र एस. ढोलकिया ने अगस्त, 2017 में रेपो रेट (अल्पकाल के लिए बैंकों के ब्याज दरों को प्रभावित करने वाली दर) में 0.25 फीसद की कटौती को बेहद कम करार देते हुए तत्काल 0.25 की कटौती का प्रस्ताव किया था।

उन्होंने 0.40 फीसद तक की कटौती की उम्मीद जताई थी। हालांकि आरबीआइ के गवर्नर उर्जित पटेल, डिप्टी गवर्नर विरल वी. आचार्या समेत अन्य पांच सदस्य उनके इस विचार से सहमत नहीं हुए।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि अगस्त के मुकाबले सितंबर, 2017 में महंगाई में नरमी आई है लेकिन महंगाई को बढ़ाने वाले जो कारक पहले मौजूद थे, वे अभी भी हैं। मसलन, कई सदस्यों ने वैश्विक अस्थिरता का हवाला देते हुए कहा था कि इससे महंगाई बढ़ सकती है, यह हालात अभी भी जस के तस है।

प्रमुख रिसर्च एजेंसी कोटक इकोनोमिक रिसर्च ने शुक्रवार को जारी अपनी रिपोर्ट में इस स्थिति का जिक्र करते हुआ कहा है कि समिति का रवैया काफी एहतियात बरतने वाला है।

सदस्यों ने महंगाई की दर, वैश्विक अनिश्चितता, राजकोषीय घाटे की खराब स्थिति आदि का जो जिक्र किया है, उसमें बहुत बदलाव नहीं आया है। आरबीआइ ने साल के लिए चार फीसद की महंगाई दर तय की है।

अभी जबकि राजकोषीय घाटा लक्ष्य से ज्यादा होने की स्थिति में पहुंच गया है तब एमपीसी के लिए ब्याज दरों को लेकर ज्यादा ढिलाई बरतना शायद ही संभव हो। समिति में शामिल सरकार के तीन सदस्यों में से दो ने ब्याज दरों को अभी मौजूदा दरों को ही बनाये रखने की बात कही है।

समिति के अध्यक्ष व आरबीआइ गवर्नर उर्जित पटेल ने इसकी बैठक में कहा कि जीएसटी की वजह से अनिश्चितता बढ़ी है। इस वजह से निवेश गतिविधियों में भी अवरोध बना रह सकता है। इसलिए जीएसटी को लागू करने में जो शुरुआती दिक्कतें आ रही हैं उन्हें तुरंत दूर किया जाना चाहिए।’